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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
गोव्राह्मणहितार्थाय़ रणे चाभिमुखो हतः |  ४३   क
त्रेताग्निमन्त्रपूतं वा समाविश्य द्विजो भवेत् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति