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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
स्वभावकर्म च शुभं यत्र शूद्रेऽपि तिष्ठति |  ४८   क
विशुद्धः स द्विजातिर्वै विज्ञेय़ इति मे मतिः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति