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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
सर्वोऽय़ं व्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीय़ते |  ५०   क
वृत्ते स्थितश्च सुश्रोणि व्राह्मणत्वं निगच्छति ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति