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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
व्राह्मण्यमेव सम्प्राप्य रक्षितव्यं यतात्मभिः |  ५७   क
योनिप्रतिग्रहादानैः कर्मभिश्च शुचिस्मिते ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति