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अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
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महेश्वर उवाच
एतत्ते सर्वमाख्यातं यथा शूद्रो भवेद्द्विजः |  ५८   क
व्राह्मणो वा च्युतो धर्माद्यथा शूद्रत्वमाप्नुते ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति