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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ते ग्रसन्त इवाकाशं वेगवन्तो महावलाः |  २३   क
क्षेत्रं धर्मस्य कृत्स्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरन् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति