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वन पर्व
अध्याय १३१
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श्येन उवाच
विरोधिषु महीपाल निश्चित्य गुरुलाघवम् |  ११   क
न वाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुदाचरेत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति