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उद्योग पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
प्रय़ाहि शीघ्रं कैतव्य व्रूय़ाश्चैव सुय़ोधनम् |  ६   क
श्रुतं वाक्यं गृहीतोऽर्थो मतं यत्ते तथास्तु तत् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति