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वन पर्व
अध्याय १३१
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राजो उवाच
गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोऽपि वा |  १६   क
त्वदर्थमद्य क्रिय़तां यद्वान्यदभिकाङ्क्षसे ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति