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भीष्म पर्व
अध्याय ७८
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं च समरे तूर्णं विव्याध साय़कैः |  ४६   क
षष्ट्या च त्रिंशता चैव तदद्भुतमिवाभवत् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति