वन पर्व  अध्याय १०८

लोमश उवाच

क्वचिदाभोगकुटिला प्रस्खलन्ती क्वचित्क्वचित् |  ११   क
स्वफेनपटसंवीता मत्तेव प्रमदाव्रजत् |  ११   ख
क्वचित्सा तोय़निनदैर्नदन्ती नादमुत्तमम् ||  ११   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति