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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
एवमेतन्महावाहो धर्मेषु परिनिष्ठितम् |  ४६   क
स्वप्तव्यं क्षत्रिय़ेणाजौ शरतल्पगतेन वै ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति