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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
स पुनर्भरतश्रेष्ठ क्रोधाद्रक्तान्तलोचनः |  १०१   क
तलं तलेन संहत्य सन्दश्य दशनच्छदम् |  १०१   ख
स्वसूतमव्रवीत्क्रुद्धो द्रोणपुत्राय़ मां वह ||  १०१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति