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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
निमेषान्तरमात्रेण साश्वसूतरथद्विपाम् |  ११४   क
अक्षौहिणीं राक्षसानां शितैर्वाणैरशातय़त् ||  ११४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति