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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
निकृत्तैर्हस्तिहस्तैश्च विचलद्भिरितस्ततः |  ११७   क
रराज वसुधा कीर्णा विसर्पद्भिरिवोरगैः ||  ११७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति