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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
त्रिभिश्चान्यैः शरैस्तीक्ष्णैः सुपुङ्खै रुक्ममालिनम् |  १२८   क
शत्रुञ्जय़ं च वलिनं शक्रलोकं निनाय़ ह ||  १२८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति