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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
स भित्त्वा हृदय़ं तस्य राक्षसस्य महाशरः |  १३१   क
विवेश वसुधां शीघ्रं सपुङ्खः पृथिवीपते ||  १३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति