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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
शपेऽहं कृष्णचरणैरिष्टापूर्तेन चैव ह |  १४   क
यदि त्वां ससुतं पापं न हन्यां युधि रोषितः |  १४   ख
अपय़ास्यसि चेत्त्यक्त्वा ततो मुक्तो भविष्यसि ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति