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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
साग्रं शतसहस्रं तु हय़ानां तस्य धीमतः |  १८   क
सोमदत्तं महेष्वासं समन्तात्पर्यरक्षत ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति