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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
अपि कीटः पतङ्गो वा भवेय़ं शङ्कराज्ञय़ा |  ९६   क
न तु शक्र त्वय़ा दत्तं त्रैलोक्यमपि कामय़े ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति