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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
तं विसञ्ज्ञं समालोक्य युय़ुधानशरार्दितम् |  २४   क
द्रौणिरभ्यद्रवत्क्रुद्धः सात्वतं रणमूर्धनि ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति