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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
पराङ्मुखाय़ दीनाय़ न्यस्तशस्त्राय़ याचते |  ३   क
क्षत्रधर्मरतः प्राज्ञः कथं नु प्रहरेद्रणे ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति