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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
भुजगा इव वेगेन वल्मीकं क्रोधमूर्छिताः |  ३८   क
ते शरा रुधिराभ्यक्ता भित्त्वा शारद्वतीसुतम् |  ३८   ख
विविशुर्धरणीं शीघ्रा रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति