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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
द्वावेव किल वृष्णीनां तत्र ख्यातौ महारथौ |  ४   क
प्रद्युम्नश्च महावाहुस्त्वं चैव युधि सात्वत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति