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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
कथं प्राय़ोपविष्टाय़ पार्थेन छिन्नवाहवे |  ५   क
नृशंसं पतनीय़ं च तादृशं कृतवानसि ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति