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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
शपे सात्वत पुत्राभ्यामिष्टेन सुकृतेन च |  ६   क
अनतीतामिमां रात्रिं यदि त्वां वीरमानिनम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति