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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन्द्रोणपुत्र गमिष्यसि |  ६२   क
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति