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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
स मार्गणगणैर्द्रौणिर्दिशः प्रच्छाद्य सर्वतः |  ७३   क
शतं रथसहस्राणां जघान द्विपदां वरः ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति