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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामानमुक्त्वैवं ततः सौवलमव्रवीत् |  ८२   क
वृतः शतसहस्रेण रथानां रणशोभिनाम् ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति