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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
पुरञ्जय़ो दृढरथः पताकी हेमपङ्कजः |  ८५   क
शल्यारुणीन्द्रसेनाश्च सञ्जय़ो विजय़ो जय़ः ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति