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शान्ति पर्व
अध्याय १३२
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भीष्म उवाच
व्रह्मक्षत्रं सम्प्रविशेद्वहु कृत्वा सुदुष्करम् |  १४   क
उच्यमानोऽपि लोकेन वहु तत्तदचिन्तय़न् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति