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शल्य पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्वास्ते च नदी देवं गङ्गा वै सरितां वरा |  २०   क
दधार पृथिवी चैनं विभ्रती रूपमुत्तमम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति