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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
स्तैन्यान्निवृत्ताः सततं सन्तुष्टाः स्वधनेन च |  १२   क
स्वभाग्यान्युपजीवन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति