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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
दानधर्मतपोय़ुक्तः शीलशौचदय़ात्मकः |  १६   क
वृत्त्यर्थं धर्महेतोर्वा सेवितव्यः सदा नरैः |  १६   ख
स्वर्गवासमभीप्सद्भिर्न सेव्यस्त्वत उत्तरः ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति