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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
आत्महेतोः परार्थे वा नर्महास्याश्रय़ात्तथा |  १८   क
ये मृषा न वदन्तीह ते नराः स्वर्गगामिनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति