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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
श्लक्ष्णां वाणीं निरावाधां मधुरां पापवर्जिताम् |  २०   क
स्वागतेनाभिभाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति