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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
कटुकां ये न भाषन्ते परुषां निष्ठुरां गिरम् |  २१   क
अपैशुन्यरताः सन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति