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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
एष वाणीकृतो देवि धर्मः सेव्यः सदा नरैः |  २६   क
शुभः सत्यगुणो नित्यं वर्जनीय़ा मृषा वुधैः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति