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अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
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भीष्म उवाच
न जातु त्वमिति व्रूय़ादापन्नोऽपि महत्तरम् |  २७   क
त्वङ्कारो वा वधो वेति विद्वत्सु न विशिष्यते |  २७   ख
अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत् ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति