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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः |  ३३   क
भजन्ति मैत्राः सङ्गम्य ते नराः स्वर्गगामिनः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति