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शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
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श्रीभगवानु उवाच
न चादिं न मध्यं तथा नैव चान्तं; कदाचिद्विदन्ते सुराश्चासुराश्च |  २५   क
अनाद्यो ह्यमध्यस्तथा चाप्यनन्तः; प्रगीतोऽहमीशो विभुर्लोकसाक्षी ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति