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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
देवि धर्मार्थतत्त्वज्ञे सत्यनित्ये दमे रते |  ४   क
सर्वप्राणिहितः प्रश्नः श्रूय़तां वुद्धिवर्धनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति