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उद्योग पर्व
अध्याय १२७
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वैशम्पाय़न उवाच
या हि शक्या महाराज साम्ना दानेन वा पुनः |  १५   क
निस्तर्तुमापदः स्वेषु दण्डं कस्तत्र पातय़ेत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति