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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
हन्त तेऽहं प्रवक्ष्यामि देवि कर्मफलोदय़म् |  ४७   क
मर्त्यलोके नराः सर्वे येन स्वं भुञ्जते फलम् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति