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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
निर्दय़ः सर्वभूतानां नित्यमुद्वेगकारकः |  ४९   क
अपि कीटपिपीलानामशरण्यः सुनिर्घृणः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति