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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
सत्यधर्मरताः सन्तः सर्वलिप्साविवर्जिताः |  ५   क
नाधर्मेण न धर्मेण वध्यन्ते छिन्नसंशय़ाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति