अनुशासन पर्व  अध्याय १३२

महेश्वर उवाच

निरय़ं याति हिंसात्मा याति स्वर्गमहिंसकः |  ५१   क
यातनां निरय़े रौद्रां स कृच्छ्रां लभते नरः ||  ५१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति