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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
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भीष्म उवाच
रक्तं शिरसि धार्यं तु तथा वानेय़मित्यपि |  ७७   क
काञ्चनी चैव या माला न सा दुष्यति कर्हिचित् |  ७७   ख
स्नातस्य वर्णकं नित्यमार्द्रं दद्याद्विशां पते ||  ७७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति