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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
पापेन कर्मणा देवि वद्धो हिंसारतिर्नरः |  ५३   क
अप्रिय़ः सर्वभूतानां हीनाय़ुरुपजाय़ते ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति