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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
यस्तु शुक्लाभिजातीय़ः प्राणिघातविवर्जकः |  ५४   क
निक्षिप्तदण्डो निर्दण्डो न हिनस्ति कदाचन ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति